अभिषेक जोशी की की flydreams publication से प्रकाशित पहली किताब ‘आखरी प्रेमगीत’ को पाठकों ने काफी सराहा था।
यह उपन्यास न सिर्फ एक प्रेमकथा थी, बल्कि इसमें फंतासी के साथ-साथ आध्यात्मिक तत्वों का समावेश होने के कारण अभिषेक जोशी जी अपनी पहली ही किताब के साथ उन गिने –चुने प्रयोगधर्मी लेखको की सूची में आ गए हैं जो हिंदी साहित्य के पाठको को ‘कुछ हटकर’ देना चाहते है।
अभिषेक जोशी जी की आगामी किताब covid 19 - अंत या एक नई शुरुआत 'कोरोना’ जैसी भयावह महामारी की शुरुवात से लेकर वर्तमान में उससे उत्पन्न विनाशक परिस्तिथियों पर आधारित एक काल्पनिक उपन्यास है ।
आज हम galpgyan.com की इस साक्षात्कार श्रृंखला
ने रूबरू होने जा रहे है अभिषेक जोशी जी से !
प्रश्न- जोशी जी! साक्षात्कार के लिए अपना
कीमती समय देने के लिए धन्यवाद् !
शुरुवात करते हैं परिचय से, सबसे पहले तो अपने
बारे में कुछ बताइये। कहाँ से है आप? और क्या करते है?
उत्तर- सबसे पहले तो आपका बहुत-बहुत धन्यवाद
अरविन्द जी! जो आपने अपने लोकप्रिय ब्लॉग के लिए मेरा इंटरव्यू लेने में रूचि
दिखायी। मैं कामना करता हूँ कि आपका ब्लॉग हिट होता रहे।
अब आपके प्रश्न पर आता हूँ। वैसे तो मेरे बारे
में अधिक कुछ बताने को नहीं है। मैं इंदौर से हूँ। मेरा जन्म, शिक्षा,
विवाह
आदि सभी इंदौर में हुआ है। लेकिन मूल रूप से मेरा परिवार राजस्थान से है। राजस्थान
के नाथद्वारा के पास के ‘उथनोल’ गाँव से हम लोग
है। मेरे परदादा ‘केवलराम जी’ के कम उम्र में
गुजरने के बाद, उनके जमाई मेरे दादा जी को इंदौर ले आए थे। उस
समय मेरे दादा की उम्र १४ वर्ष थी। उन्होंने लोगों के घरों में पीने का पानी भरने
का काम शुरू किया था। फिर बर्तन-झाड़ू का काम करते हुए इंदौर की प्रसिद्द कपड़ा मील
में नौकरी करने लगे। जिससे उन्हें नौ रुपये महीना तनखा मिलती थी। कुछ बाद में
उन्हें सुबह-शाम दूध बाँटने का काम मिल गया। जो बाद में कुछ बढ़कर मेरे पिता जी
मिली। पिता से वो दूध का व्यापार, विरासत मुझे मिलना चाहिए था। लेकिन
व्यापार में घाटा होने से नहीं हो सका। फिर मैंने बीएससी और एमबीए इन मीडिया किया
हुआ था। दूध की दूकान मुझे शोभा कैसे देती? लेकिन तब भी एक लम्बे समय तक मैं दूध और किराने की
दूकान चलाता रहा। दूध के व्यापार में घाटा होने के बाद मेरे पिता किराने की दुकान
चलाने लगे थे।
बीच के एक दौर में मैं मुम्बई भी गया। बाद में
वहाँ से आकर कई काम करता रहा। जिनमें कॉपी राईटिंग, एड्टिंग,
प्रूफ
रीडिंग, जैसे आधा दर्जन काम रहे।
लेकिन मैं नौकरी के लिए नहीं बना था। मुझे किसी की गुलामी करना पसंद नहीं
था। इसलिए खुद का कोई कार्य करने के विषय में सोचने लगा।
अपने कॉलेज के दिनों में मैं पढ़ाने का काम करता
था। सो उसी काम को आगे करने का सोचा। मैंने लेखन में करिअर आजमाने के साथ खुद का
इंस्टिट्यूट ‘ओशन क्लासेस’ खोला। वर्तमान
में मैं यही दो काम करता हूँ। जिसमें मेरे माता-पिता और पत्नी का बहुत सहयोग रहता
है।
प्रश्न- लेखन का चस्का कैसे लगा आपको? पहली
रचना कौन सी थी? कितना समय लगा उसे पूरा करने में?
उत्तर- लिखने का चस्का मुझे कैसे लगा? अगर
सच कहूँ तो किसी को प्रभावित करने के लिए लिखना शुरू किया था। “लव
लेटर...’ हालाँकि, उस समय मैं १३-१४ साल का ‘नादान’
ही
था, पर कलम अच्छी घसीटता था। फिर दूकान पर बैठते के दौरान काफी खाली समय
होता था। जो मैं पत्र-पत्रिकाएँ और किताबें पढ़ने से पूरा करता था। शायद उन किताबों
या ह्रदय की भावनाओं ने ही मुझे प्रेरित किया कि मुझे लिखना चाहिए। मगर एमबीए करने
तक भी मुझे पक्का नहीं था कि मैं लेखन से जुड़ पाऊंगा। मगर २०१४ में यात्रा उपन्यास
प्रकाशित करवा कर मैंने एक छोटी सी कोशिश ज़रूर की। फिर २०१६ में बिजनोर के देवता,
इश्क
समंदर, चंचल मन की शाश्वत कविताएँ और एक साधक की आत्मकथा प्रकाशित करवा कर
उस कोशिश को और बड़ा करने का प्रयास किया। साल दर साल बीतने पर यह कोशिश और वृहतर
होती जा रही है। आप देख ही रहे है, आखिरी प्रेम गीत और कोविड 19: अंत
या एक नई शुरुआत तक मैं पहुँच ही गया हूँ। अगले कुछ महीनों में एक विशाल संग्रह
बनने वाला है। द रियल टाइम मशीन, तेरी प्रेम कहानी, भक्त
से भगवान् तक और ... बहुत कुछ इंतज़ार कर रहा है।
प्रश्न-
आपकी पिछली किताब ‘आखिरी
प्रेम गीत’ एक अलग विषय पर आधारित थी। आमतौर पर हिंदी
साहित्य में ऐसे प्रयोग कम ही पढ़ने को मिलते है। एक प्रेमकथा के साथ साथ
आध्यात्मिक और फंतासी के मिश्रण का विचार आपके मन मे कैसे आया?
उत्तर- अरविन्द जी! आपने मेरे मन का प्रश्न पूछ
लिया। आखिरी प्रेम गीत ऐसी कहानी है जिसकी कल्पना मैंने आज से दस साल पहले कर ली
थी। मुझे शुरू से चमत्कारों के प्रति विचित्र सा आकर्षण रहा है। जिस कारण मैं
यथार्थ के संसार से कही दूर विचरण करता हूँ। मेरी पूरी सोच और मेरा पूरा ह्रदय उस
अदृश्य और सम्पूर्ण को जानने की जिज्ञासा करता है। और उसे ही ढूँढने तथा निकट से जानने की अभिलाषा में मैं इस प्रकार
की कल्पनाएँ गढ़ता रहता हूँ, जिसका एक नमूना आपने आखिरी प्रेम गीत
में देखा।
प्रश्न- आप आध्यात्मिक विषयों में भी काफी रुचि
रखते है। आध्यात्मिक सफर के बारे में कुछ
बताइये।
उत्तर- आध्यात्म से जुड़ना मेरे जीवन का टर्निंग
पॉइंट रहा है। दो घटनाओं ने, जिनका
मैं उल्लेख करूँगा, मेरे जीवन की दिशा को गहरे रूप में प्रभावित
किया है; और उसकी तरंगे अब तक और आगे भी मेरे जीवन को प्रभावित करती रहेंगी।
लेकिन उससे पहले यह बताना चाहूँगा कि धार्मिक संस्कार मुझे बचपन से मिले थे। मैं
एक सामान्य हिन्दू की तरह भिन्न-भिन्न अवसरों पर मंदिरों में देवी-देवताओं की
मूर्तियों के आगे माथा टेककर पंडित या किसी अन्य भक्त से प्रसाद पाता था। स्कूल की
परीक्षाओं के दिनों में शिद्दत से उनके आगे प्रार्थना भी करता था। लेकिन फिर एक
दिन पहली घटना घटी। उस समय मैं आठवी-नवी कक्षा में रहा होऊंगा। मेरे मन में
किन्हीं विशेष परिस्थितियों में यह प्रश्न उठा कि क्या भगवान् होता है? और
अगर होता है तो क्या उसे देखा जा सकता है? उस समय तक मैंने किसी भी धार्मिक
पुस्तक या व्यक्ति की जीवनी को नहीं पढ़ा था। तो इस प्रश्न ने एक खोज शुरू कर दी।
हालाँकि यह खोज बुद्धि और उसके तर्कों पर आधारित थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि
मैं आस्तिक से नास्तिक हो गया। मैंने किसी
भी भगवान् को मानने से इनकार कर दिया। मैंने मंदिरों में और उसके देवी-देवताओं के
आगे शीश झुकाने के इनकार कर दिया। मैं घर पर भी किसी धार्मिक कार्यक्रम में भाग
नहीं लेता था। एक तरह से मेरा सबसे विरोध हो गया था। यह एक अलग कहानी है।
करीब पाँच-छह साल बाद जब मैंने ग्रेजुएशन पूरा
कर लिया एक पुस्तक मेले में स्वामी विवेकानंद की पुस्तक मेरे हाथ लगी। बस यही वो
दूसरी घटना है जिसने एक नास्तिक को फिर से आस्तिक बनाने का काम किया। मेरी बुद्धि
और तर्कों में क्या कमी थी जो मुझे भगवान् से मिलने से रोक रही थी, उस
पुस्तक को पढ़ने से समझ आ गया। इसके बाद मैंने कमर कस ली कि जब तक मैं भगवान् को
साक्षात नहीं देखा लेता पीछे नहीं हटूंगा।
प्रश्न- फिर क्या आपको भगवान् मिले?
उत्तर- आपको यकीन नहीं आएगा, लेकिन
हाँ, एक दिन मुझे वो मिला जिसे मैं खोज रहा था। मेरे सभी प्रश्न उस दिन
ख़त्म हो गए।
प्रश्न-
यह एक लम्बी बातचीत का विषय लगता है। जिसे हम फिर कभी लेंगे। आप यह बताए कि
लेखन में रिसर्च को कितना महत्व देते हैं? आपकी
आगामी किताब COVID 19 अंत या एक नई शुरुरात पेपर बेक में आने वाली
है। उसके लिए आपने कितनी रिसर्च की? किताब के बारे में भी थोड़ी जानकारी
दीजिए।
उत्तर-
कुछ भी अच्छा और बेहतर लिखने के लिए रिसर्च बहुत ज़रूरी है। इसे आप लेखन का
अंग मानकर चले। आप जितनी रिसर्च करेंगे, उतना आपकी कहानी बेहतर होती चली जाएगी।
कोविड 19 भी एक शोधपरक उपन्यास है, जिसमें मैंने अपनी कल्पना का मिश्रण
किया है। कहानी को पढ़ते हुए आपको यही लगेगा कि दुनिया में यह नई महामारी इसी
प्रकार आई होगी, जैसा मैंने उपन्यास में दिखाया है। लेकिन फिर
आप चौकेंगे। आपको पढ़ते हुए अलग ही आनंद की अनुभूति होगी। क्योंकि आपको उपन्यास में
माइथोलॉजी का स्वाद भी मिलेगा। आप सोचेंगे कि क्या हो अगर मेरी कल्पना सच हो?
अच्छा!
एक और विशेष बात है इस उपन्यास के बारे में कि उपन्यास माननीय प्रधान मंत्री जी को
समर्पित है। क्यों? इसका कारण आपको उपन्यास कि प्रति खरीदकर पढ़ने
पर ज्ञात हो जाएगा।
प्रश्न- लिखने के अलावा एक पाठक के रूप में आप
किन लेखकों की रचना पढ़ना पसन्द करते है? और खाली वक्त
में किस तरह की पुस्तकें पढ़ते हैं आप?
उत्तर-
मेरी रूचि आध्यात्म में अधिक है। इसलिए अधिकांशतः आध्यात्मिक महापुरुषों की
जीवनी और उनके कार्यों के विषय में ही पढ़ता रहा हूँ। लेकिन फिर भी मैंने प्रेमचंद,
रविन्द्रनाथ,
भगवतीशरण
वर्मा, धर्मवीर भारती, नरेन्द्र कोहली जी इत्यादि जैसे लेखकों
से प्रेरणा ली है। विशेष रूचि कालजयी उपन्यासों और पुरुस्कृत रचनाओं में रहती है।
विदेशी लेखकों की अनुवादित पुस्तकें भी पढ़ता हूँ। खाली समय वैसे तो कम ही मिलता है,
लेकिन
मिलता है तो उसे पढ़ने के बजाय फ़िल्में देखने में खर्च करता हूँ।
प्रश्न- आगामी प्रोजेक्ट्स क्या है। भविष्य में
आपके पाठको को किस तरह की किताबें पढ़ने को मिलेगी?
उत्तर- आगामी महीनों में आपको इतिहास आधारित
विज्ञान फंतासी ‘द रियल
टाइम मशीन’ पढ़ने को मिलेगी। मेरा पहला ड्रीम प्रोजेक्ट है
यह। फिर आप पढ़ेंगे दो और प्रेम कहानी। फिर एक नॉन फिक्शन किताब और संभव हुआ तो फिर
मेरा दूसरा ड्रीम प्रोजेक्ट जिसका नाम मैं अभी नहीं बता सकता। सभी पढ़ने को मिलेंगे।
प्रश्न- अंत मे नए लेखकों के लिए क्या संदेश
देना चाहेंगे आप?
उत्तर-
यह बड़ा अजीब प्रश्न है! क्योंकि मैं खुद नया लेखक हूँ। पहले मुझे पुराना
होने दीजिए। फिर इस प्रश्न पर सोचेंगे। हाँ, अपने पाठकों को
ज़रूर एक सन्देश देना चाहूँगा।
प्रिय पाठकों!
आपको कोटि-कोटि प्रणाम! आपने आखिरी प्रेम गीत
उपन्यास को जो प्यार दिया है, उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। कृपया
ऐसा ही प्यार मेरी आने वाली हर किताब को दीजिए। और मेरी किताबें पीडीएफ में न पढ़े।
अगर पढ़े तो कृपया मुझे अपनी राय से अवगत ज़रूर कराए। क्योंकि आपकी राय ही मेरे अगले
उपन्यास को और बेहतर बनाएगी।
धन्यवाद!
धन्यवाद अरविन्द जी!
साक्षात्कार देने के लिए धन्यवाद जोशी जी।
आशा
करते है आप भविष्य में भी लेखन से साथ ऐसे अनोखे प्रयोग करते रहेंगे और आपको यूँ
ही पाठकों का भरपूर स्नेह मिलता रहेगा।
अभिषेक जोशी जी का नया उपन्यास covid 19 अंत या एक नई शुरुवात ' आप इस लिंक से आर्डर कर सकते है । https://imojo.in/FlyD_May21_Preorder



10 टिप्पणियाँ
दिल खोलकर किया वार्तालाप पसंद आया। अभिषेक जोशी और अरविंद नेगी को सफल साहित्यिक सफर की हार्दिक शुभकामनाएं
जवाब देंहटाएंआपको साक्षात्कार पसन्द आया जानकर अच्छा लगा। उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद मनमोहन जी।
हटाएंधन्यवाद सर
हटाएंबहुत खूब....यह साक्षात्कार बहुत ही पसंद आया मुझे अब तो बेचैनी सी हो रही है की कब जल्द से जल्द "covid-19 एक अंत या एक नई शुरुआत " पेपर बैक में आए और मैं पढू इस कहानी को.... इस बात ने मुझे और जिज्ञासू कर दिया है कि ये किताब माननीय प्रधानमंत्री को समर्पित है !
जवाब देंहटाएंसाक्षात्कार आपको पसंद आया जानकर अच्छा लगा। 😊
हटाएंथैंक यू नैवेद्य।
हटाएंअच्छा साक्षात्कार है; संक्षिप्त और सरस। ईश्वर-अस्तित्व सम्बन्धी जिज्ञासा का समाधान भी हो सकता था, किन्तु उस उत्तर को पूरा नहीं होने दिया गया, ये बात बेहद खली।
जवाब देंहटाएंजी इस साक्षात्कार में इतने बड़े विषय की चर्चा संभव नही थी। अभिषेक जी के साथ इस पर कभी विस्तार से चर्चा करें।
हटाएंवाह, बहुत बढ़िया👌
जवाब देंहटाएंdhanyawad sir!
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